Monday, July 18, 2011

गुमनाम सी ये जिंदगी..........

 
गुमनाम सी ये जिंदगी..........कभी खलासी तो कभी शनि उपासक बनती है। नेहरू, गांधी के दावे, दावे ही रह गए...... न बचपन बदला.... न बदहाली।

Wednesday, February 16, 2011

यहां बहार, वहां बयार

ये दोनों तस्वीरें राजस्थान के सर्वाधिक सरसब्ज जिले श्रीगंगानगर की है। इस वक्त जहां खेतों में सरसों के पीले फूलों की चादर बिछी हुई है और सरसराती हवा बसंत के आने का संदेश दे रही है। वहीं धन-धान्य से भरपूर इस जिले का एक स्कूल ऐसा है जहां बच्चों के सर पर टीन-टप्पर की टूटी-फूटी ऐसी छत है जो कभी भी गिर सकती है। भरी सर्दी में बच्चे ठंडी बयार को सहते हुए भी राजकीय उच्च प्राथमिक स्कूल, नंबर 10, श्रीगंगानगर में पढ़ाई को जारी रखे हुए हैं। इस उम्मीद में कि उनका आने वाला कल इन खेतों की तरह रंगों से भरा खिलखिलाता हुआ हो। 

Wednesday, January 26, 2011

ये कैसा गणतंत्र, जहां बालमन नही स्वतंत्र


भले ही आज हम गणतंत्र दिवस के उल्लास में डूबे हों, सरकारी व चौथे स्तंभ के झूठे प्रचार-प्रसार के बल पर जय भारत जय इंडिया कर रहे हों, लेकिन क्या वाकई आज हम गणतंत्र के सही मायनों पर खरे उतर पाए हैं। हैरत की बात है कि हमारे देश का आधार स्तंभ यानी बालमन ही हजारों बेडिय़ों में जकड़ा हुआ है। सरकार की कथित तमाम कोशिशों के बावजूद बच्चों की एक बड़ी आबादी मेहनत की भट्टी में तपने को मजबूर है। आसमान में पतंग उड़ाने, कहीं दूर तक सैर तक जाने, मजे -मौज और पढ़ाई करने वाले दिनों में अपनी इच्छाओं का दमन करके दुनिया के लगभग एक करोड़ बच्चे कहीं कल -कारखानों में, कहीं होटलों में तो कहीं बंद कोठियों की साफ -सफाई में लगे हैं। कानून किताबों में पड़ा उंघ रहा है। क्योंकि उसे जगाने वाले हाथ देखकर भी कुछ नहीं करते बल्कि कई बार तो वह खुद ही कानून तोड़ते नजर आते हैं। और इस पर भी दर्दनाक बात यह कि बच्चों के मुददे कभी विधानसभा और संसद में गंभीरता और नियमितता से नहीं उठाए जाते। कारण साफ है, बच्चों का वोट नहीं होता। यदि हम सरकारी आंकड़ों पर ही गौर करें तो पता चलता है कि देश में वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक लगभग सवा करोड़ बाल मजदूर हैं। जबकि गैर सरकारी आकंड़े इससे तीन गुणा अधिक है। देश के गरीब तबके से जुड़े अधिकांश बच्चे बेहतर शिक्षा से वंचित हैं। शारीरिक व मानसिक विकास की बात भी बेमानी है। भारतीय संविधान संशोधन के बाद देश के चौदह वर्ष तक के हर बच्चे को अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा का अधिकार दिया गया है। लेकिन यह भी फौरी घोषणा बनता दिखाई दे रहा है। आज भले ही हम गणतंत्र के अवसर पर सरकारी घोषणाओं को सुन कर खुश हो रहे हों, लेकिन क्या कभी गौर किया कि पहले की घोषणाओं से देश, समाज या हमें कितना फायदा हुआ। बच्चों की ही बात लीजिए, बच्चों को स्वास्थ्य और पोषण की व्यवस्था, निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा तथा बालश्रम को दूर कर संरक्षण की व्यवस्था करना बेहद जरूरी है एवं अनेक बार अलग-अलग सरकारों ने घोषणाएं की हैं। लेकिन फिर भी हालात जस के तस बने हुए हैं, बल्कि कह सकते हैं कि हालात और अधिक बिगड़ते जा रहे हैं। निश्चित ही स्थिति खासा भयावह है, लेकिन इस ओर ध्यान देने का साहस किसी में नहीं। किसी के पास इतना वक्त नहीं कि देश के बालमन पर गौर करे, उन्हें मजदूरी से बचाए, उन्हें निशुल्क शिक्षा व स्वास्थ्य सेवा दे। आखिर ये कब तक चलेगा? कब तक यूं ही बालमन घुट-घुट कर जीएगा? और हम कब तक गणतंत्र-स्वतंत्र दिवस पर झूठी, महत्वहीन और खोखली खुशी मनाएंगे? 

Wednesday, January 19, 2011

बचपन


कहीं पे फिर से बचपन बिछड़ा, मां ने आंसू से आंचल धोया,
रात कहीं पे जमीं फिर महफिल, एक पहाड़ी भूखा खोया।

Tuesday, January 18, 2011

गरीबी बनाम वोट और बाल अपराध

यह निर्विवाद सत्य है कि देश में अधिकांश बाल अपराध पारिवारिक गरीबी के कारण होते हैं। यही गरीबी अशिक्षा का कारण भी बनती है। जबकि सभी सरकारें हर बार गरीबी हटाने का खोखला दावा करते हुए सत्तासीन होती हैं। सत्ता में आने के बाद उन्हें गरीबी और गरीबों से कोई सरोकार नहीं रहता। देखा जाए तो हर अपराध के पीछे कहीं न कहीं प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में राजनेताओं का हाथ होता है। बाल अपराध जैसे गंभीर विषय की जड़ तक जाएं तो यहां भी वही गरीबी और वही राजनेता नजर आते हैं। हालांकि संविधान के अनुच्छेद 45 के तहत 2003 में 93वें संविधान संशोधन के तहत श्रम के घण्टे कम कर बच्चों को बालश्रम से मुक्ति व पुनर्वास के लिए विशेष विद्यालय एवं पुनर्वास केन्द्रों की व्यवस्था की गई है। साथ ही रोजगार से हटाए गये बच्चों को अनौपचारिक शिक्षा, व्यवसायिक प्रशिक्षण, अनुपूरक पोषाहार आदि की व्यवस्था करने के लिए भी सरकार को प्रतिबद्ध किया गया है। उधर, उच्च न्यायालय ने अपने दिसम्बर 1996 के बाल श्रम से सम्बन्धित निर्णय में बालश्रम के लिए गरीबी को उत्तरदायी मानते हुए कहा कि जब तक परिवार के लिए आय की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो पाती, तब तक बालश्रम से निजात पाना मुश्किल है। यानी समझा हर कोई है, लेकिन सतह तक पहुंचने के लिए किसी के पास समय नहीं है। वर्ष 2006 का किशोर न्याय संशोधन अधिनियम 2006 के द्वारा बच्चों के लिए अधिक मैत्रीपूर्ण एवं महत्वपूर्ण है। लेकिन सच्चाई यह है कि देश में बाल अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है। बच्चे अपराधी न बने इसके लिए आवश्यक है कि अभिभावकों और बच्चों के बीच बर्फ-सी जमी संवादहीनता एवं संवेदनशीलता को फिर से पिघलाया जाये। फिर से उनके बीच स्नेह, आत्मीयता और विश्वास का भरा-पूरा वातावरण पैदा किया जाए। श्रेष्ठ संस्कार बच्चों के व्यक्तित्व को नई पहचान देने में सक्षम होते हैं। शिक्षा पद्धति भी ऐसी ही होनी चाहिए। गहरे अपनेपन के आधार पर अभिभावकों और बच्चों के बीच की दूरी और दरार को मिटाकर वर्तमान समस्याओं से उपजते बाल-अपराध से निजात पाई जा सकती है। हमें बच्चों को उचित संस्कार देने व उनमें मानवीय मूल्यों की स्थापना करने के लिए सजग, सचेष्ट और सक्रिय होना होगा। तभी इस बिगड़ते बचपन और भटकते राष्ट्र के नव पीढ़ी के कर्णधारों का भाग्य और भविष्य उज्जवल हो सकता है। अन्यथा सरकार व राजनेताओं के भरोसे हालाद दिन ब दिन बदतर होते जाएंगे। क्योंकि 61 वर्षों के अंतराल में बाल अपराध कम होने की बजाए बढ़ता ही जा रहा है, ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकारें हमारा, देश का या बच्चों को कैसे उद्धार करेगी। 

Sunday, December 12, 2010

20 लाख से ज्यादा बच्चों की असमय मौत

ग्लोबल मूवमेंट फॉर चिल्ड्रन(जीएमसी) के जरिए जो सर्वेक्षण कराए गए हैं उससे भारत में नौनिहालों की खस्ता हालात का पता चलता है। इस सर्वेक्षण के मुताबिक देश में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की हालात सबसे बद्त्तर है। बीमारियों, कुपोषण और दूसरे कारणों से देश में हर साल 20 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत असमय हो जाती है। इतना ही नहीं, तीन साल से कम उम्र के 46 प्रतिशत बच्चे कम वजन के होते हैं। और पांच साल से कम उम्र के कुपोशित एक तिहाई बच्चे भारत में हैं। जाहिर है कुपोषित बच्चों की सबसे ज्यादा तादाद भारत में बसती है। यूनीसेफ से ताल्लुक रखने वाले चीफ फील्ड सर्विस एडार्ड बीगबेडर के मुताबिक समाज के जिस तपके से ये बच्चे ताल्लुक रखते हैं वह तपका समाज का सबसे कम जागरूक है। जागरूकता न होने की वजह से बच्चों की ठीक तरह से देखभाल और पोषण नहीं हो पाता है। इससे जहां बच्चे जल्द कुपोशण का शिकार बन जाते हैं वहीं पर बचपन से ही उनमें ऐसी तमाम गम्भीर बीमारियां लग जातीं हैं जो उनकी मौत का कारण बनतीं हैं। ज्यादाती बच्चों की मौत डायरिया और निमोनिया से होती है। यानी खराब पानी और खराब भोजन के कारण ज्यादातर बच्चे मौत का षिकार होते हैं।
देश और विदेश के बाल विषेशज्ञों के मुताबिक भारत में शिशु मृत्युदर सबसे ज्यादा होने के तमाम वजहों में सबसे बड़ी वजह बच्चों के प्रति परिवार और समाज का इनके प्रति गैरजिम्मेदाराना रवैया है। इस गैरजिम्मेदाराना रवैया के चलते निम्न मध्य और निम्नवर्ग परिवारों से ताल्लुक रखने वाले इन बच्चों की हालात मजलूमों जैसी होती है। दूसरी तरफ केंद्र और राज्य सरकारों का स्वास्थ्य मंत्रालय भी इनके प्रति बेहद लापरवाही बर्तता है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक बच्चों की सुरक्षा और पोशण के लिए आवंटित रकम ज्यादातर भ्रष्‍टाचार की भेंट चढ़ जाती है। विभाग के कर्मचारी, अधिकारी और चिकित्सक बच्चों की सुरक्षा को लेकर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते हैं। खासकर गांवों और कस्बों के स्वास्थ्य विभागों की हालात बहुत ही बदतर होती है। दवा और देखभाल दोनों की हालात खराब होती है। कहा जाता है-’गांवों में दवा है तो डॉक्टर नहीं, डॉक्टर हैं तो दवा नहीं। यानी हर स्तर पर लापरवाही बरती जाती है। सबसे ताज्जुब की बात यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस बिडम्बना को जानते हुए भी इसमें कोई सुधार नहीं करते हैं। इस लिए देश का बचपन अंधकार की तरफ दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है।
संयुक्त राष्‍ट्र संघ भारत के संकटग्रस्त नौनिहालों को लेकर अनगिनत बार चिंता व्यक्त कर चुका है लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें आजादी के 64 साल बाद भी इस तरफ कोई कारगर कदम नहीं उठा सकी हैं। फाइलों में भले ही बच्चों की सुरक्षा और उचित पोशण के बहुत सारे कदम उठाने की बात लिखी जाती हो, लेकिन सच्चाई को इससे कोई लेना-देना नहीं होता है। इस गैरजिम्मेदाराना बर्ताव के कारण शिशुओं की हालात इस वजह से दिनोंदिन खराब होती जा रही है। आने वाले वक्त में यदि सरकारें इस तरफ कोई जिम्मेदाराना कदम नहीं उठातीं तो बच्चों की मृत्युदर और भी बढ़ सकती है, इसमें कोई दो राय नहीं है।°°साभार- प्रवक्ता.कॉम